22 February, 2012

फ़ॉन्ट कन्वर्टर अब नए साइट से डाउनलोड/प्रयोग करें
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यूनिकोड से संस्कृत 99 कन्वर्टर Unicode-to-sanskrit99 converter07.htm

यूनिकोड से रिचा कन्वर्टर Unicode-to-Richa converter02.htm

यूनिकोड से एचटी चाणक्य कन्वर्टर Unicode-to-HTChanakya converter02.htm

यूनिकोड से डीवी-योगेश-एन कन्वर्टर Unicode-to-DV-YogeshEN converter03.htm

यूनिकोड से डीवीबी योगेश एन कन्वर्टर Unicode-to-DVB-YogeshEN converter08.htm

यूनिकोड से डीवीबीडबल्यू योगेश एन कन्वर्टर Unicode-to-DVBW-YogeshEN converter04.htm

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24 June, 2010

बस प्यार नहीं खरीदा जा सकता

अथाह संपत्ति होने के बाद भी हम अपने दिवंगत परिजन के लिए जीवन खरीदना तो दूर परिवार के दो सदस्यों के बीच समाप्त हुआ प्यार तक नहीं खरीद सकते। फिर ऐसे पैसे की अंधी दौड़ भी किस काम की जो भाइयों में दीवार खड़ी कर दे, एक दूसरे के खून का प्यासाबना दे। और हम अपने बुजुर्गों से विरासत में मिले संस्कारों को भी भुला दे।

17 June, 2010

दर्द बढ़ाने के लिए ना जाएं

अस्पताल मे दाखिल अपने किसी परिचित को हम जाते तो हैं यह अहसास कराने के लिए कि इस संकट में हम आपके साथ हैं। इसके विपरीत अंजाने में ही हम अपने अधकचरे मेडिकल नालेज को इस तरह बयां करते हैं कि इलाज करने वाले डाक्टरों की टीम से मरीज के परिजनों का विश्वास उठने लगता है। इसके विपरीत एक अन्य मित्र हैं, जितनी देर मरीज के पास बैठते हैं हल्के-फुल्के मजाक से कुछ देर के लिए ही सही मरीज की सारी उदासी ठहाकों में बदल देते हैं।


हमारे एक दोस्त की माताजी आईजीएमसी अस्पताल मे दाखिल थीं। सूचना मिली तो हम भी उनकी मिजाजपुर्सी के लिए चले गए। करीब आधा घंटा वहां रुकने के दौरान मेरे लिए सीखने की बात यह थी कि वे डाक्टरों द्वारा दिए जा रहे उपचार से पूर्ण संतुष्ट दिखे शायद यही कारण था कि मां के स्वास्थ्य को लेकर अनावश्यक रूप से चिंतित भी नहीं थे। उनका तर्क सही भी था चिंता करने से तो मां ठीक होने से रही। हमने भी माताजी की बीमारी को लेकर अपना अधकचरा ज्ञान नहीं बघारा। जितने वक्त वहां बैठे, हम उनके साथ इधर उधर की बातें करते रहे। सुबह से रात तक अकेले ही मां की सेवा में लगे रहने के साथ अस्पताल से ही आफिस के अपने साथियों को कार्य संबंधी निर्देश भी देते जा रहे थे।

मैं जिस मित्र के साथ गया था, उन्होंने मदद के लिए जो प्रस्ताव रखा सुनकर मुझे अच्छा लगा। उन्होंने कहा माताजी की देखभाल के लिए या रात में अस्पताल रुकना हो तो तुम्हारी भाभी और मैं रुक जाऊंगा। तुम आराम कर लेना । चूंकि वे दिन रात अकेले ही अस्पताल में रुक रहे थे तो मैने उन्हें वक्त काटने के लिए किताब भिजवाने का प्रस्ताव रखा, उन्होंने जिस उत्साह से स्वीकृ ति दी उससे हमें लग गया कि अकेले आदमी के लिए, वह भी अस्पताल में समय काटना कितना मुश्किल होता है।

इस सोच के विपरीत हमारे सामने अकसर ऐसे दृश्य भी आते रहते हैं जब अस्पताल में मरीज की तबीयत देखने की खानापूर्ति करने वाले बजाय उसे और परिजनों को ढाढस बंधाने की अपेक्षा उसी तरह की बीमारी के शिकार रहे लोगों की ऐसी हारर स्टोरी सुनाते हैं कि ठीक होता मरीज भी दहशत का शिकार हो जाता है। यही नहीं बीमारी को लेकर अपना आधा अधूरा ज्ञान इस विश्वास के साथ दोहराते हैं कि कई बार मरीज और परिजन

पसोपेश में पड़ जाते हैं कि ईलाज सही भी हो रहा है या नहीं।

क्या हम ऐसा नहीं कर सकते कि अपने किसी प्रियजन के अस्पताप में दाखिल होने की सूचना मिले तो कल देख आएंगे कि अपेक्षा बाकी कामों से थोड़ा वक्त निकाल कर उसी दिन देख आएं क्योंकि कल किसने देखा, शायद इसीलिए कहा भी तो जाता है काल करे सो आज क र । कोई भरोसा नहीं कि कल हम और ज्यादा आवश्यक काम में उलझ जाएं, मरीज को अस्पताल से छुट्टी मिल जाए या हालत ज्यादा बिगड़ जाने पर अन्य किसी शहर ले जाना पड़े।

हममें से कई लोग अस्पताल में तबीयत देखने जाते भी हैं तो खाली हाथ। एक गुलदस्ता साथ लेकर तो जाएं, अस्पताल के उस पूरे रूम के साथ मरीज के चेहरे पर भी फूलों सी ताजगी झलकती नजर आएगी। एक परिचित हैं उन्हें बस पता चलना चाहिए कि कोई अपना परिचित दाखिल है। उसके परिजनों को अपना ब्लडग्रुप बताएंगे, फोन नंबर नोट कराएंगे कि आपरेशन की स्थिति में खून की जरूरत पड़े तो तत्काल सूचित कर दें। मरीज के पास जितनी देर भी बैठेंगे, उससे उसकी बीमारी पर तो चर्चा करेंगेे ही नहीं। उसे जोक्स सुनाएंगे, हल्के फुल्केे मजाक करते रहेंगे। मैंने जब उनसे कारण पूछा तो उनका जवाब था, एक तो पहले ही वह सुबह से शाम तक अपनी बीमारी को लेकर लोगों के सुझाव सुनता रहता है। लोग आते तो हैं उसका दुख कम करने के लिए लेकिन अंजाने में ही उसका तनाव बढ़ाकर चले जाते हैं। ऐसी स्थिति में हल्के फुल्के मजाक से वह थोड़ी देर खुलकर हँस लेता है तो इसमें गलत क्या है। बात तो एकदम सही है। मैने जब खुद का मूल्यांकन किया तो कई कमियां नजर आई हैं जिनमें सुधार के लिए मैने तो शुरुआत भी कर दी है। कहा भी तो है हम दूसरों की गलतियों से खुद में सुधार ला सकते हैं।

10 June, 2010

अच्छे सिर्फ बाहर के लिए ही क्यों

हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और। हमारा चरित्र भी कुछ ऐसा ही हो गया है। हम अन्य शहरों में जब सपरिवार जाते हैं तो पत्नी बच्चों के साथ हमारा व्यवहार बदल जाता है। हम खुद को उस शहर के मुताबिक ढालने का भी प्रयास करते हैं लेकिन जैसे ही अपने शहर की सीमा में प्रवेश करते हैं, फिर पुराने वाले हो जाते हैं। हम अच्छाइयां स्वीकार भी करते हैं तो अपनी सुविधा से लेकिन बुराइयां आसानी से और हमेशा के लिए पालन करने लग जाते है।


दो दिन की लगातार बारिश के बाद जैसे ही मौसम खुला शिमला में रंगीन छतरियों की रौनक के बदले माल रोड पर सैलानियों की चहल पहल नजर आने लगी। नगर निगम भवन के सामने माल रोड पर एक दुकान से अपने बच्चों के लिए पिता ने नाश्ते का सामान लिया और बच्चों के हाथ में प्लेट पकड़ा दी। ये सभी खाते-खाते आगे बढ़ गए। उनमें से एक बच्चे ने सबसे पहले नाश्ता खत्म किया और खाली प्लेट सड़क पर उछाल दी। कुछ आगे जाने पर पिता को ध्यान आया कि बेटे ने जूठी प्लेट सड़क पर ही फेंक दी है। बच्चों को वहीं रुकने की समझाइश देकर पिता पीछे लौटे और सड़क से प्लेट उठाकर एमसी भवन के बाहर सड़क किनारे रखे डस्टबीन में डाल दी। वापस बच्चों के पास लौटते वक्त उनकी आंखों में इस तरह के भाव थे कि उनके इस अच्छे काम को किसी ने नोटिस भी किया या नहीं।

कितना अजीब लगता है जब हम अपने किसी रिश्तेदार के यहां, किसी अन्य शहर या विदेश में कहीं जाते हैं तो हमारा व्यवहार बिना किसी की सलाह या समझाइश के खुदबखुद बदल जाता है। हम उस शहर के मुताबिक खुद को ढालने की कोशिश करने लग जाते हैं। इस बदलाव के पीछे दंड-जुर्माने का भय तो रहता ही है साथ ही अपने शहर, अपने परिवार की नाक नीची न हो जाए यह सजगता भी रहती है। इस दौरान हम अपने स्टेटस को लेकर इतने सतर्क रहते हैं कि पत्नी बच्चों से भी कुछ ज्यादा ही सम्मान से पेश आते हैं। कई बार तो हमारे बच्चे इस व्यवहार पर त्वरित प्रतिक्रिया भी व्यक्त कर देते हैं।

ऐसा क्यों होता है कि अपने घर, अपने शहर पहुंचते ही फिर हम पुराने ढर्रे पर चलने लगते हैं। विदेशों, अन्य शहरों की अच्छाइयों को हम अपने लोगों के बीच प्रचारित भी करते हैं तो उसमें मुख्य भाव यह दर्शाना ज्यादा होता है कि लोग जान लें हम उस जगह होकर आए हैं। शहर तो दूर हम अपने घर तक में उन बातों क ो लागू नहीं कर पाते जिनकी प्रशंसा करते नहीं थकते । पत्नी को जो सम्मान हम बाहर देते हैं, घर पहुंचने के बाद उसे हम कामकाजी महिला से ज्यादा कुछ समझते ही नहीं। हमारा रवैया ऐसा क्यों हो जाता है कि उसकी उपयोगिता ऑर्डर का पालन करने वाली से ज्यादा नहीं है। तब हम यह क्यों नहीं याद रखते कि वह सुबह से शाम तक शासकीय कार्यालय, बैंक आदि संस्थान में सेवा देने के बाद घर के सारे काम अपनी पीड़ा छुपाकर पूरे कर रही है। हमें हमारा सिरदर्द तो असहनीय लगता है लेकिन भीषण कमर दर्द के बाद भी रसोईघर में काम निपटाती पत्नी का हाथ बटाना तो दूर उसका दर्द पूछना भी जरूरी नहीं समझते।

शिमला में पॉलीथिन पर प्रतिबंध हमें बहुत अच्छा लगता है लेकिन अपने शहर में जाने के बाद फिर हम यह अच्छी बात भूल जाते हैं। पहले की तरह फिर पॉलीथिन में रात का बचा खाना आदि बांधकर खिड़की से ही सीधे कचरे के ढेर की तरफ उछाल देते हैं। तब हमें यह अहसास नहीं होता कि उस जूठन को खाने की कोशिश में गाय पूरी पॉलीथिन भी निगल जाएगी।

हमारे कारण उसकी आंतों में उलझी यही पॉलीथिन उसकी मौत का कारण भी बन सकती है यह भी भूल जाते हैं। हमारा चरित्र कुछ ऐसा हो गया है कि अच्छाइयां या तो हमें स्थायी तौर पर प्रभावित नहीं करती या फिर अच्छी बातों का पालन भी हम अपनी सुविधा या डंडे के जोर से ही करने के आदी हो गए हैं।

03 June, 2010

काम तो अपने ही आएंगे,पैसा नहीं

ऐसा क्यों होता है कि साया भी जब हमारा साथ छोड़ जाता है तभी हमें अपनों की कमी महसूस होती है। शायद इसीलिए कि जब ये सब हमारे साथ होते हैं तब हमें इनकी अहमियत का अहसास नहीं होता। विशेषकर राजनीति में अपने नेता के लिए रातदिन एक करने वाले तब ठगे से रह जाते हैं कि लाल बत्ती का सुख मिलते ही नेता अपने ऐसे ही सारे कार्यकर्ताओं को भूल जाता है। सुख-दु:ख के बादल उमड़ते घुमड़ते रहते हैं लेकिन छाते की तरह खुद को भिगोकर हमें बचाने वाले अपने लोगों के त्याग को हम अपने प्रभाव के आगे कुछ समझते ही नहीं। ऐसे ही कारणों से हमें बाद में पछताना भी पड़ता है।

माल रोड की ओर से आ रहे अधेड़ उम्र के एक व्यक्ति मुझ से टकरा गए। कुछ गर्मी का असर और कुछ उनकी लडख़ड़ाती चाल, मैंने ही सॉरी कहना ठीक समझा। बदले में वो ओके-ओके कहकर ठिठक गए तो मुझे भी रुकना ही पड़ा। फिर करीब पंद्रह मिनट वो अंग्रेजी-हिंदी में अपना दर्द सुनाते रहे कि दिल्ली में रह रहे पत्नी बच्चों से कई बार फोन पर कह चुका हूं शिमला आ जाओ, आजकल करते-करते छह महीने निकाल दिए। कमरा लेकर अकेले रह रहे उन सज्जन की बातों से यह भी आभास हुआ कि पति पत्नी में कुछ अनबन चल रही है। अकेलेपन की पीड़ा, बच्चों की याद और कुछ नशे के खुमार से उनकी आंखें छलछला आई। बार बार कह रहे थे पत्नी बच्चों के प्यार से प्यारा दुनिया में और कुछ नहीं, अभी वे लोग आ जाएं तो शिमला के ये गर्मी भरे दिन भी ठंडे हो जाएंगे मेरे लिए। अपना गम सुनाने के साथ ही वे ङ्क्षड्रक करने का सच स्वीकारने के साथ यह भी पूछते जा रहे थे स्मैल तो नहीं आ रही है, ज्यादा नहीं बस दो तीन पैग लिए हैं। मैंने जैसे-तैसे उनसे गुडबॉय कह कर पीछा छुड़ाया।

मैंने कई लोगों को देखा है, यूं तो फर्राटेदार हिंदी में बात करते रहते हैं लेकिन पता नहीं इस अंगूर की बेटी का क्या जादू है, इसका सुरूर चढ़ते ही अंग्रेजी में शुरू हो जाते हैं। मुझे नहीं लगता कि लोग अंग्रेजी शराब के कारण अंग्रजी बोलने लगते होंगे। दरअसल मुझे तो कुछ लोगों के साथ यह ठीक से अंगे्रजी नहीं बोल पाने की कुंठा लगती है जो थोड़ा सा नशा होने पर कुलांचे मारने लगती है। इस बहाने ही सही आदमी के मन में दबा सच और उसकी कुंठा बाहर तो आ जाती है। हल्के से नशे ने उस अधेड़ व्यक्ति के लिए तो आत्म साक्षात्कार का ही काम किया होगा वरना इतनी तीव्रता से बीवी, बच्चों से दूरी का अहसास नहीं होता।

इसके विपरीत हम अपने आसपास ऐसे लोगों को भी देखते हैं जो दौलत के नशे में चूर होने के कारण हर चीज को पैसे से ही तोलते हैं उन्हें किसी की भलाई, अपनेपन की भी परवाह नहीं होती क्योंकि ऐसे लोग उस मानसिकता के होते हैं जो यह मानकर चलते हैं हर चीज पैसे से खरीदी जा सकती है। ऐसा सोचने वाले यह भूल जाते हैं कि ऐसा भी वक्त आ सकता है जब पैसा होने के बाद भी कई बार हाथ मलते रह जाने जैसे हाल हो जाते हैं। जोर की भूख लगी हो लेकिन कुछ खाने को ही नहीं मिल पाए, किसी सुनसान रास्ते में हमारे किसी परिचित की तबीयत बिगड़ जाए और उपचार न मिल पाने के कारण जान ही चली जाए। इस तरह के हालात में तो जेब में रखे बैंकों के एटीएम, पर्स में रखे नोट भी कुछ देर तो बेकार ही रहेंगे।

सदियों से कहते और सुनते आए हैं पैसा तो हाथ का मैल है लेकिन हम है कि इस सच को समझना ही नहीं चाहते कि जब पैसा नहीं था तब हम लोगों के कितने करीब थे और जब से पैसा बरसने लगा तब से कौन लोग हमारे करीब हैं। क्यों हमें अपने लोगों की जरूरत अकेलेपन या मुसीबत में ही महसूस होती है। शायद इसीलिए की जो हमारे अपने होते हैं उन्हें हमारे पैसे कि नहीं हमारी परवाह होती है। जो अपना है वह सुख में हमसे दूरी बनाना जानता है लेकिन हम कभी मुसीबत में घिर जाए तो पल पल साथ रहने के बाद भी यह दर्शाने कि कोशिश नहीं करता कि वह हमारे साथ है। ये खुशियों की बारिश और सुख दु:ख के ये बादल शायद इसीलिए उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं कि हम अपने परायों कि पहचान करना तो सीख ही जाएं। ऐसे में भी यदि हम समझ ना पाएं तो फिर अपनों से दूर रहने पर उनकी कमी महसूस करना ही विकल्प बचता है। ऐसा बुरा वक्त जीवन मेें न आए इसका तरीका तो यही है कि हम पैसों से ज्यादा अपनों को महत्व दें। वरना तो चिडिय़ा खेत चुग जाएगी और हम हाथ ही मलते रह जाएंगे।

27 May, 2010

जो नहीं मिला उसका ज्यादा दुख

हम अपने घर की हालत तो सुधार नहीं पाते मगर दूसरों के अस्त-व्यस्त घरों को लेकर टीका टिप्पणी करने से नहीं चूकते। हमारा स्वभाव कुछ ऐसा हो गया है कि पड़ोसी का सुख तो हमसे देखा नहीं जाता। उसके दुख में ढाढस बंधाने के बदले सूई में नमक लगाकर उसके घावों को कुरेदने में हमेशा उतावले रहते हैं।
जब पुरानी संदूकों के ताले खोले जाते हैं तो सामान उथल-पुथल करते वक्त ढेर सारे नए खिलौने भी हाथ में आ जाते हैं। तब याद आती है कि घूमने गए थे तब ये तो बच्चों के लिए खरीदे थे। उन्हें खेलने के लिए सिर्फ इसलिए नहीं दिए कि एक बार में ही तोड़ डालेंंगे। अब खिलौने हाथ आए भी तो तब, जब उन बच्चों के भी बच्चे हो गए, और इन बच्चों के लिए लकड़ी और मिट्टी के खिलौने इस जमाने में किसी काम के नहीं हैं। उन्हें इससे भी कोई मतलब नहीं कि इन छोटे-छोटे खिलौनों में दादा-दादी का प्यार छुपा है।
अब हम इस बात से दुखी भी हों तो इन बच्चों क ो कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उनके लिए अपना सुख ज्यादा मायने रखता है। ऐसे में कई बुजुर्ग कलपते हुए प्रायश्चित भरे लहजे में स्वीकारते भी हैं कि उसी वक्त हमारे बच्चों को खेलने के लिए दे देते तो ज्यादा अच्छा रहता। ऐसा किया होता तो निश्चित ही उस वक्त बच्चों को खुशी मिलती पर उससे हमारा अभिभावक वाला गुरूर खत्म हो जाता, शायद इसीलिए संदूक में रखकर ताला लगाकर भूल गए।
हम सब लगभग इसी तरह के प्रसंगों का सामना करते ही हैं। हमारे बुजुर्गों की न तो ज्यादा आवश्यकताएं थीं और इससे भी महत्वपूर्ण यह कि वे हर हाल में खुश रहना और हालातों से समझौता करना जानते थे। अब ऐसा नहीं है, हमारे पास जो है उसे हम भोग नहीं पाते और जो हमेंं मिलना संभव नहीं उसे पाने के प्रयास में घनचक्कर हुए जाते हैं। पूरी जिंदगी मेें हममें से कई लोग तो यह तय ही नहीं कर पाते हैं कि उन्हें क्या करना है और इस दुनिया में उनक ी कुछ उपयोगिता भी है या नहीं। हम कभी संतुष्ट नहीं हो पाते। लिहाजा परिस्थितियों से समझौता करना नहीं समझ पाते। समझौता करना नहीं चाहते इसी कारण अपने ही हाथों अपने जीवन को असहज बना देते हैं। जो सुख हमें मिला है उसमें खुश होने की अपेक्षा हम इस चिंता में ही अपना खून जलाते रहते हैं कि सामने वाला सुखी क्यों नजर आ रहा है। दूसरे से जलन के मामले में यूं तो हम महिलाओं के स्वभाव का जिक्र तत्काल करने लगते हैं लेकिन पुरुष स्वभाव भी इस मामले में बिल्कुल महिलाओं जैसा ही है। हमें अपना पांच हजार का जूता और दस हजार का मोबाइल एक दिन बाद ही तब घटिया लगने लगता है जब हमारा पड़ोसी अपने जूते और मोबाइल का दाम हमसे ज्यादा बताता है। यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी महिला ने भले ही दस हजार की साड़ी और पचास हजार का हार क्यों न पहन रखा हो, शादी समारोह में वह पड़ोस से गुजरी महिला के नेकलेस की फुसफुसाते हुए तारीफ इसी अंदाज में करेगी मेरे हार से उसका हार कितना अच्छा है न, मुझे भी ऐसा ही लेना था। बस कहते जरूर हैं कि हमे किसी से मतलब नहीं, अपने में मस्त रहते हैं, पर क्या वाकई हमारी कथनी और करनी में अंतर नहीँ है। हम तब ही अपने में मस्त रहते हैं जब सामने वाला मुसीबत में हो। उस वक्त हम चिंतित रहते भी हैं तो इसलिए कि कहीं वह दुखी आदमी आकर हमारे सामने अपना दुखड़ा न रोने लगे। सामने वाला रात-दिन मेहनत करके तरक्की कर भी ले तो हम उसकी यह तरक्की इसलिए नहीं पचा पाते क्योंकि उस मुकाम तक हम नहीं पहुंच पाए। हमें अपना काम तो सर्वश्रेष्ठ लगता है लेकिन दूसरे के काम में हम कमिया ही तलाशते रहतेे हैं।

हम अच्छा करना नहीं चाहते और कोई हमसे आगे निकल जाए यह हमें पसंद नहीं। हमारा बच्चा परीक्षा में अच्छे नंबरों से पिछड़ जाए तो पेपर कठिन होना, तबीयत खराब हो जाने जैसे बहानों की मदद लेने मेें जरा सी देर नहीं लगाते। उसी क्लास में पढऩे वाला पड़ोसी का बच्चा अच्छे नंबर ले आए तो हम कहने से नहीं चूकते स्कूल वालों से पहचान है। ले-देकर नंबर बढ़वा लिए होंगे। छोटी सी जिंदगी में हमें अपना घर व्यवस्थित करने की फुरसत तो मिल नहीं पाती, दूसरे के अस्तव्यस्त घर का बखान करने में ही हम वक्त जाया करते रहते हैं। हमारे पास लोगों की मदद करने के लिए भले ही टाइम नहीं हो लेकिन सूई में नमक लगाकर उनके जख्म कुरेदने का भरपूर वक्त हमारे पास है।

एज के यर के सुझाव पर आज से ही अमल

संस्था एज केयर के अध्यक्ष डा वीके शर्मा के अनुरोध पर आज से इस कालम का पाइंट साइज कुछ बड़ा किया जा रहा है। उनका सुझाव था कि इससे वरिष्ठ नागरिकों को पढऩे में अधिक आसानी हो जाएगी।

19 May, 2010

जेब से तो कुछ नहीं जा रहा फिर इतनी कंजूसी क्यों

जिंदगी के साल कम होते जा रहे हैं और हम हैं कि अपने में ही खोते जा रहे हैं। कब, किस मोड़ पर किसकी मदद लेना पड़ जाए,यह हकीकत भी हमारी समझ में न आए। प्रेम के दो मीठे बोल, धन्यवाद का एक शब्द बोलने में हमारी जेब का एक धेला खर्च नहीं होता लेकिन हम यहां भी कंजूस बने रहते हैं, जैसे शब्दों को ज्वैलर्स की दुकान से तोले के भाव खरीद कर लाए हों। हां जब किसी की आलोचना करने का अवसर हाथ लग जाए तो इन्हीं शब्दों को पानी की फिजूलखर्ची की तरह बहाते रहते हैं।

जाने क्यों मुझे बैंक संबंधी कामकाज बेहद तनाव भरा एवं चुनौतीपूर्ण लगता है। शायद यही कारण है कि जब किसी नई बैंक में काम पड़ता है तो मैं इस सकारात्मक विचार के साथ बैंक में प्रवेश करता हूं कि कोई मददगार जरूर मिल जाएगा। माल रोड स्थित पीएनबी की शाखा में एकाउंट खुलवाने के लिए गया तो वहां पदस्थ मुकेश भटनागर मेरे लिए खुदाई खिदमतगार ही साबित हुए। कोई आपके लिए मददगार साबित हो तो क्या वह धन्यवाद का भी पात्र नहीं होता। मुझसे यह भूल हुई, लेकिन कुछ पल बाद ही मैंने सुधार कर लिया।

तनख्वाह के बदले सेवा देना किसी भी शासकीय, अशासकीय कर्मचारी का काम है। काम के बदले में हम चेहरे पर आभार के भाव और हल्की सी मुस्कान के साथ छोटे से धन्यवाद की गिफ्ट भी तो दे सकते हैं। उस कर्मचारी के लिए यह उपहार किसी भारी भरकम पुरस्कार से ज्यादा महत्व रख सकता है।

यह ठीक है कि थैंक्स की अपेक्षा के बिना भी सबकी मदद करना हमारा स्वभाव होना चाहिए लेकिन इसका मतलब यह भी नहीें कि हमें यदि शुगर के कारण मीठे से परहेज करना पड़ रहा है तो मेहमान को भी फीकी चाय ही पिलाएं। हम में से ज्यादातर लोगों का रेल्वे, बस स्टैंड की टिकट खिड़की, टेलिफोन, बिजली, पानी के बिल जमा कराने, अपने कार्यालय में मातहत साथी से, बैंक, स्कूल आदि में अक्सर कर्मचारियों से काम पड़ता ही रहता है। आभार के रैपर में, मुस्कान के धागे में लिपटी थैंक्स की गिफ्ट भेंट करना अकसर हमें याद ही नहींं रहता। सुबह से शाम तक लाखों का लेनदेन करने वाले बैंक कैशियर को आपके थैंक्स से कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन कल्पना तो करिए जब शाम को टोटल करते वक्त हजार-पांच सौ रुपए का अंतर आ जाए तो वह कर्मचारी खाना पीना भूल जाता है। अस्पताल में दाखिल हमारे रिश्तेदार का सफल आपरेशन करने वाले डाक्टर को तो हम थैंंक्स कहने में देर नहीं करते लेकिन बैंक में पैसा जमा करने, टिकट खिड़की या बिल जमा करने वाले काउंटर पर तैनात कर्मचारी की कार्यप्रणाली से शायद ही कोई खुश होता हो। सारे कर्मचारी एक जैसे नहीं होते लेकिन हम अपना नंबर आने तक उनके काम की समीक्षा करते हुए यह सिद्ध कर देते हैं कि उससे अधिक तेजी से काम कर के हम दिखा सकते हैं। हम ही फैसला सुना देते हैं कि सारे के सारे कामचोर, मक्कार हैं और इन्हीं जैसे कर्मचारियों के कारण देश तरक्की नहीं कर पा रहा है। दूसरों को उनकी अयोग्यता क्रा सॢटफिकेट देने के लिए तो हम उधार ही बैठे रहते हैं। कौन बनेगा करोड़पति की हाट सीट पर बैठै प्रतियोगी से ज्यादा तो हम जानते हैं। हमारा बस नहीं चलता वरना छक्का मारने से चूके सचिन को पिच पर जाकर समझा आएं कि थोड़ा सा और ऊपर उठाकर शॉट मारते तो बॉल बॉउंड्री पार हो जाती।

कभी एक दिन कैश काउंटर पर बैठ कर देखें या ओटी में आपरेशन करते डाक्टर को सहयोग करती सर्जरी वार्ड की टीम के साथियों की पल पल की मुस्तैदी देखें तो समझ आ सकता है कि नजरअंदाज किए जाने वाले हर व्यक्ति का भी कुछ ना कुछ तो सहयोग रहता ही है। इन कर्मचारियों के चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए थैंक्स कहना ही पर्याप्त होता है। अंजान राहों वाले, लंबे सफर में हम टैक्सी ड्राइवर के भरोसे सोते-जागते सफर पूरा करते हैं, किराया चुकाते वक्त मान लेते हैं उसका तो यह रोज का काम है। जरा सोचिए तो सही जान उसके हाथ में सौंप रखी थी, यदि उसे हल्की सी झपकी आ जाती तो...? महाभारत में अर्जुन यदि श्रेष्ठतम योद्धा साबित हुए तो इसीलिए की खुद भगवान श्रीकृष्ण उनके सारथी थे, इस सत्य को पांडव जानते भी थे।

रिश्ते हों या रोजमर्रा की जिंदगी, यदि सोचेंगे कि पैसे से सारे काम कराए जा सकते हैं तो जितना गुड़ डालेंगे उतना मीठा होगा। लेकिन हमारे व्यवहार में यदि कृतज्ञता और धन्यवाद वाला भाव होगा तो रिश्तों की बेल हरीभरी और बिना पानी के भी बढ़ती रहेगी। संसार सिकुड़कर अब छोटा हो गया है, जिंदगी के साल उससे भी कम होते जा रहे हैं। कब, किससे, किस मोड़ पर हमें काम पड़ जाए। रास्ते का हर पत्थर मंदिर में मूर्ति के काम नहीं आ सकता लेकिन डगमग करती पानी की मटकी को स्थिर करने, दीवार में कील ठोंकने के लिए या आम, इमली तोडऩे के लिए पगडंडी के किनारे पड़ा जो पत्थर हम तुरंत उठा लेते हैं, उस वक्त हमें कहां पता होता है कि पिछली बार इसी राह से गुजरते वक्त बीच राह में पड़े ऐसे ही किसी पत्थर को खेल-खेल में ठोकर मार कर दूर उछाल दिया था। निर्जीव पत्थर जब हमारे काम आ सकता है तो रोजमर्रा की जिंदगी में हमारे काम आ रहे सजीव इंसानों के प्रति क्या हम थोड़े से सहृदय नहीं हो सकते, इस काम में एक पैसा भी इंवेस्ट नहीं करना पड़ता है।